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सत्ययुग के उस समय जब महर्षि कस्यप और दिति के घर दो पुत्रो ने जन्म लिया। एक का नाम रखा गया हिरण्यशिपु और दूसरे का नाम रखा गया हिरण्याक्ष।
महर्षि कस्यप और दिति के घर दो पुत्रो जन्म
दोनों भाई बड़े हुए। दोनों के पास अथाह बल था। दोनों भाई ने आपस में निश्चय किया और हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को चुरा कर समुन्द्र में छिपा दिया। जिसके बाद भगवान् विष्णु का वराह अवतार हुआ। और उन्होंने हिरण्याक्ष को मार कर पृथ्वी को आज़ाद किया। जब हिरण्यकश्यप को भाई के मरने की खबर मिलती है तब वह क्रोधित होता है और भगवान् विष्णु से बदला लेने के लिए अपने राज्य से बाहर हिमालय पर जाता है और कठिन तपस्या करता है।
और इधर देवता तो देवता ठहरे , उन्होंने उसके राज्य पर आक्रमण करके उसे पराजित करते है। देवराज इंद्र हिरण्यकश्य के राज्य को पराजित कर उसकी पत्नी को स्वर्ग लेकर जाता है। उस समय हिरण्यकश्प की पत्नी कयाधु गर्भ से थी। कहा जाता है की उस समय देवराज इंद्र का प्लान उन्हें कैद करने का था। पर हुआ कुछ और , रास्ते में उन्हें देवर्षि नारद मिल गए और वो कयाधु को लेकर अपने आश्रम आ जाते है।
प्रहलाद ( Prahalad ) का जन्म

अभी आप उस समय को जी रहे है। जहां देवर्षि नारद कयाधु को वेद, पुराण, कथा, भगवान् विष्णु से जुडी कहानियाँ सूना रहे है। फिर कुछ समय बाद कयाधु एक बच्चे को जन्म देती है। नाम रखा जाता है प्रह्लाद। यही वो बच्चा है जो आगे जाकर होलिका, हिरण्यकश्प के अंत का कारण बनता है।
इधर प्रहलाद ( Prahalad ) धीरे धीरे बड़ा हो रहा है दूसरी तरफ हिरण्यकश्प अभी भी तपस्या कर रहा है। प्रह्लाद आश्रम में धीरे धीरे ५ साल का हो जाता है और साथ ही भगवान् विष्णु का भक्त भी हो जाता है। और इधर हिरण्यकश्प भगवान् विष्णु से बदला लेने के लिए तपस्या कर रहा है। कुछ समय बाद उसका तपस्या पूरा हो जाता है।
हिरण्यकश्यप का वरदान मांगना
और ब्रम्ह देव प्रगट होते है और उससे वरदान मांगने को कहते है। हिरण्यकश्प ने ब्रम्ह देव से वरदान मांगता है की वो अमर हो जाए।
पर ऐसा संभव नहीं होने के कारण ब्रम्ह देव दूसरा वरदान मांगने को कहते है और वो वरदान मांगता है। हिरण्यकश्प वरदान मांग रहा है की वो ना दिन में मरे, नाहीं रात में, नाहीं आकाश में, नाहीं पातल में, ना नर से ना नारी से, नाहीं किसी जीवित वास्तु से नाहीं किसी मृत से, आपके बनाये किसी भी चीज से मेरी मृत्यु ना हो। ये वरदान ब्रम्ह देव देकर चले गए।
ब्रह्मदेव से वरदान पाकर हिरण्यकश्यप अपने आपको अमर समझ लेता है और अपने राज्य को वापस लौट आता है। उसे देवताओ द्वारा किये गए कारनामे का पता चलता है की उसके जाने के बाद क्या क्या हुआ यहाँ। अब वो ब्रम्हदेव के वरदान से अमर हो गया था और उसमे स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया और देवताओ को जीत लिया। कयाधु और प्रह्लाद अभी भी आश्रम में है। उन दोनों को आश्रम से वापस अपने राज्य बुलाता है।
अब प्रहलाद (Prahalad) और हिरण्यकश्यप दोनों एक ही राज्य में, एक ही महल में है। और दोनों के विचार एक दम अलग है। प्रहलाद भगवान् विष्णु के भक्त है और हिरण्यकश्यप अपने आपको भगवान् घोषित कर चूका है। अब उसके राज्य में उसी की पूजा होती है , भगवान् विष्णु की पूजा वर्जित है।
हिरण्यकश्यप और प्रहलाद के बीच दूरी बढ़ती गयी
प्रहलाद जो भगवान विष्णु के भक्त हैं, वो हमेशा उन्ही की बाते करते है और हिरण्यकश्यप को भगवान् मानने से इंकार कर देते है। प्रहलाद भगवान् विष्णु की भक्ति छोड़ उसकी भक्ति करने लगे उसके लिए हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को दैत्यों के आश्रम भेज दिया। पर वहाँ हुआ कुछ और भक्त प्रहलाद( Prahalad ) ने आश्रम के बाकी बच्चों को भी भगवान् विष्णु के तरफ झुका दिया और वो सब भी भगवान् विष्णु की आराधना करने लगे। जिससे तंग आकर वह के अध्यापकों ने प्रहलाद ( Prahalad ) को वापस राज महल में छोड़ दिया।
अब फिर से दोनों लोग एक ही महल में रहने लगे। दोनों के विचार में जमींन आसमान का अंतर था। दोनों लोगो के बीच मतभेद बढ़ता गया। और साथ हो दोनों लोगो के बीच की दुरी भी। धीरे धीरे दुरी इतनी बढ़ गयी कि हिरण्यकश्यप अब प्रहलाद ( Prahalad ) को मारने की कोशिश करने लगा। भक्त प्रहलाद को मारने के लिए उसने उन्हें हिमालय से नीचे फेंकवाया, सर्प से भरे एक कमरे में अकेले छोड़ दिया, हाथियों से कुचलवाने के लिए उन्हें पागल हाथियों के बीच में छोड़ दिया , कितने दिनों तक बिना भोजन के रखा जिससे या तो वो मर जाए या फिर भगवान् विष्णु की भक्ति छोड़ दे। पर हुआ दोनों में से कुछ नहीं।
होलिका का सलाह
इन सब से तंग आकर वो अपनी बहन होलिका( Holika ) के पास जाता है जिसे आग में ना जलने का वरदान था। वो होलिका से कहता था कि बहन मै तुम्हारे भतीजे से तंग आ गया हु। इसने मेरा जीना हराम कर दिया है तुम कुछ करो। तब होलिका ने सलाह दिया की मै इसको लेकर आग में बैठ जाती हु, वो आग में जल जाएगा, मैं जलूँगी नहीं क्योकि मुझे ना जलने का वरदान है। और यही उसके जीवन की सबसे बड़ी गलती थी।
क्योकि जब किसी वरदान का दुरपयोग किया जाता है तो वो सबसे पहले उसे ही नुक्सान पहुँचता है। और हुआ भी वही , होलिका उस आग में जल गयी और एक बार फिर प्रहलाद ( Prahalad ) बच गए।
हिरण्यकश्यप का वध
इस घटना के बाद हिरण्यकश्यप के सब्र का बांध टूट गया। और अब वो खुद प्रहलाद को मारने के लिए बैचैन हो गया। जब वो प्रहलाद को मारने के लिए आगे बढ़ा तो भक्त प्रहलाद की विस्वास से भगवान् विष्णु ने नरसिंघ का अवतार लिया। और हिरण्यकश्यप का वध किया।
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